विधि का विधान : अपनी इस कविता के माध्यम से मैं यह कहना चाहती हूं कि जीवन में होने वाली हर घटना का अपना एक उद्देश्य होता है। हमारे जीवन में कई बार ऐसी परिस्थिति आती है जिसे हम चाहकर भी बदल नहीं सकते। फिर व्यर्थ की चिंता करने का क्या फायदा! अतः सुख हो या दुख, सफलता हो या असफलता। सब समय के साथ बदलते रहते हैं। यह कविता हमें धैर्य, विश्वास और सकारात्मक सोच के साथ जीवन की हर परिस्थिति को स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। तथा यह संदेश देती है कि ईश्वर की बनाई व्यवस्था पर विश्वास रखना ही सच्ची समझदारी है।
कहते हैं, भाग्य का लिखा
कोई नहीं टाल सकता
जो भाग्य में लिखा है
वह होकर ही रहेगा
जब विधि के लेख को
कोई नहीं मिटा सकता
तो फिर क्यों तुम
व्यर्थ की चिंता करते हो
तुम्हारे चिंता करने से
कुछ बदल नहीं सकता
हां, तुम्हारी जिंदगी जरूर बदल जाएगी
तुम बद से बदतर हो जाओगे।
चिंता चिता के समान है
जो आदमी को जलाकर राख कर देती है
इसलिए व्यर्थ की चिंता करना छोड़ दो
क्योंकि विधि के विधान को
कोई टाल नहीं सकता।
गौतम बुद्ध के पिता ने उन्हें
सारी सुख – सुविधाएं दी
ताकि वे दुख न देख पाएं
उन्होंने पूरी कोशिश की
कि उनका पुत्र सन्यासी न बने
मगर वह विधि के विधान को
टाल नहीं सके
और बुद्ध एकदिन सन्यासी बन गए।
कैकई ने चाहा था
उनका पुत्र भरत सिंहासन पर बैठे
मगर राज्य श्रीराम को ही मिला
यह विधि का विधान नहीं तो और क्या है।
पांडव महाशक्तिशाली थे
पर द्रौपदी के चीरहरण को रोक पाए क्या
नहीं न!
क्योंकि ऐसा होना तय था।
श्रीराम तो भगवान हैं
पर सीता माता के हरण को रोक पाए क्या
नहीं न!
क्योंकि यह विधि का विधान था।
सबकुछ विधि के अधीन है
आपकी जिंदगी में जो होना है
वह पहले से ही तय है
इसका मतलब यह नहीं कि
आप हाथ पे हाथ धरकर बैठे जाएं
अपने सपनों को पूरा करने के लिए
प्रयास करना ही छोड़ दें।
सोच लें, जो होना है
वह तो होगा ही
फिर क्या करना है मेहनत करके।
सुनो! एक बात हमेशा याद रखना
भाग्य दिशा देता है
तो कर्म उस दिशा की ओर
चलने का साहस देता है।
इसलिए कर्म करते रहो
निराशा को मन में
घर मत बनाने दो
जो होना है, होगा
और जो नहीं होगा
वह भी एक सीख बन जाएगा।
बस तुम्हे अच्छे कर्म करते जाना है
तुम सिर्फ कर्म के अधिकारी हो
परिणाम तो विधि के हाथ में है
होगा वही, जो नियति को मंजूर है।
फिर व्यर्थ की चिंता कैसी!
बस हंसते रहो, मुस्कुराते रहो
चलते रहो, आगे बढ़ते रहो
कर्म करते रहो
कर्म करते रहो।





