परिचय:-
हम अक्सर अपनी कीमत दूसरों की राय से आंकने लगते हैं। जब कोई हमारी आलोचना करता है या हमारा सम्मान नहीं करता, हमें तबज्जों नहीं देता, तो हम खुद को कमजोर समझने लगते हैं। लेकिन सच यह है कि किसी की सोच आपकी पहचान तय नहीं कर सकती। आइए पढ़ते हैं एक प्रेरणादायक कहानी, जो हमें अपनी वास्तविक कीमत समझाती है।
अपनी कीमत खुद पहचानो कहानी के माध्यम से मैं आपको कुछ बताना चाहता हूं।मेरा नाम अर्जुन है। मेरे पापा डॉक्टर हैं और मम्मी हाउसवाइफ। मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। मैं छोटा था तब भी और अब भी मुझे किताबों के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है। कभी -कभी तो किताबों में इतना खो जाता हूं कि सुध ही नहीं रहती कि खाना भी खाना है। मम्मी हमेशा इस बात पर टोकती हैं।
मैं हमेशा क्लास में अव्वल आता हूं। पापा चाहते हैं कि मैं भी उनकी तरह एक कामयाब डॉक्टर बनूं। मैं भी उनके सपनों को पूरा करना चाहता हूं। क्योंकि मैंने बचपन से डॉक्टर बनने का सपना देखा था।
10th पास करने के बाद मैने नीट की तैयारी शुरू कर दी थी। मैं पूरी। मेहनत, लगन, ईमानदारी के साथ तैयारी कर रहा हूं फिर भी मुझे अच्छा कॉलेज नहीं मिल पा रहा है।फिर भी मैं लगातार प्रयास कर रहा हूं। पर अब मेरे रिश्तेदार, पड़ोसी और दूसरे लोग मुझे ताने मारते हैं, तंज कसते हैं। पापा से अक्सर पूछते हैं, तुम्हारे बेटे का क्या हुआ? क्या इस बार भी उसका सिलेक्शन नहीं हुआ? जब लोग बार बार पूछते हैं तो पापा को भी अच्छा नहीं लगता। मुझे सुनाकर लोग आपस में बातें करते हैं अरे! स्कूल में फर्स्ट डिवीजन पास होने से, टॉप करने से कोई इंटेलिजेंट नहीं हो जाता। लोग रट्टा लगाकर यूं ही टॉप कर लेते हैं। नीट क्वालीफाई करना हर किसी के बस की बात नहीं है। मेरे आस – पास के लोग तो मेरे मुंह पर ही हंसी हंसी में बोल देते हैं, ‘तीन बार में तो नीट निकाल नहीं पाया। काहे का इंटेलिजेंट है तू, क्यों टाइम बेस्ट कर रहा है।’ लोगों की इस तरह की बातें सुनकर मेरा आत्मविश्वास डगमगाने लगा है। जिस अर्जुन को खुद पर अपने – आप से ज्यादा भरोसा था वही अर्जुन अब खुद पर संदेह करने लगा है। जिस अर्जुन को लगता था कि वह एक दिन डॉक्टर जरूर बनेगा वही अर्जुन अब मन ही मन सोचता है वह डॉक्टर बन भी पाएगा या नहीं।
मुझे अपनी काबिलियत पर शक होने लगा है। मैं बहुत परेशान सा रहने लगा हूं।
एक दिन मैं अपने पुराने टीचर के घर गया। हो सकता है वह मेरी कुछ मदद कर सकें। मुझे इस समस्या से बाहर निकाल सकें। यह सोचकर मैने उन्हें अपनी परेशानी बता दी।
सर बिना कुछ कहे मेरी बात ध्यान से सुनते रहे। फिर मुझे अपने घर में बगीचे में ले गए। वहां एक पेड़ से उन्होंने एक सुंदर सा गुलाब का फूल तोड़ा। और उसे मिट्टी में गिरा दिया। मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। मैं मन ही मन सोच रहा था कि सर आखिर कर क्या कर रहे हैं।
सर कुछ देर खामोश रहे फिर आहिस्ता से बोले ” अब इसे उठाओ।” मैने फूल उठाया।उस पर थोड़ी धूल लग गई थी। मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा था कि सर कर क्या रहे हैं?
फिर सर ने पूछा ” क्या अब यह फूल सुंदर नहीं लग रहा?”
मैंने धीरे से कहा “सुंदर तो अभी भी है बस थोड़ी सी धूल लग गई है।।”
सर ने फूल को साफ किया फिर बोले “बेटा, इंसान भी इसी फूल की तरह होता है। जीवन में कभी अपमान, असफलता या लोगों की बुरी बातें उस पर धूल की तरह जम जाती हैं। लेकिन इससे उसकी असली कीमत कम नहीं हो जाती। हमें अपनी कीमत खुद पहचानना चाहिए।उन्होंने आगे कहा”जो लोग दूसरों की बातों से टूट जाते हैं। वे अपनी काबिलियत, अपनी शक्ति भूल जाते हैं। उन्हें एकदिन दुनियां भी सम्मान देती है।”
अब मेरे मन का सारा बोझ उतर गया था। उस दिन मैंने एक बड़ा निर्णय लिया कि मैं लोगों को खुश करने के बजाय, लोगों की बातों पर ध्यान देने के बजाय अपने सपनों को पूरा करने पर ध्यान दूंगा। अब मैं लोगों की बातों से खुद को प्रभावित नहीं होने दूंगा। अब मैं पहले से अधिक मेहनत करने लगा। कई बार असफल हुआ लेकिन हर बार पहले से अधिक मजबूती के साथ खड़ा रहा। और एकदिन मैं डॉक्टर बन गया। जो लोग मेरा मजाक बनाते थे, मुझे हतोत्साहित करते थे। अब वही लोग मेरी प्रशंसा करने लगे थे।
मैं डॉक्टर बनने के बाद सर से मिलने गया। मैं भावुक होते हुए बोल पड़ा”सर, उस दिन आपने मुझे सिर्फ एक फूल नहीं दिखाया था, बल्कि मेरी असली पहचान भी समझा दी थी।”
सर मुस्कुराए और बोले “याद रखो, दुनियां की नजरें बदलती रहती हैं। लेकिन इंसान की असली पहचान उसके चरित्र, उसके कर्म और उसके आत्मसम्मान से तय होती है। जो स्वयं का सम्मान करना सीख जाता है उसकी कीमत कभी कम नहीं होती।




