मेरा नरम दिल ही मेरी कमजोरी है
क्योंकि मैं हर किसी पर
जल्दी विश्वास कर लेती हूं
और छोटी छोटी बातों को भी
दिल से लगा लेती हूं
क्या करूं
ये दिल है ही ऐसा
लोगों पर बहुत जल्दी
विश्वास कर लेता है
कोई थोड़े से आंसू बहाकर
झूठी बातों को
सही साबित कर दे
तो मुझे लगने लगता है कि
सामनेवाला सही बोल रहा है।
मेरी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि
मैं सच और झूठ में
अंतर ही नहीं कर पाती
मुझे लगता है कि
जैसी मैं हूं
वैसे ही दुनियां में सब हैं।
कोई मेरे साथ
कितना भी छल – कपट कर ले
कितनी भी नफरत कर ले
और बाद में थोड़ा प्यार से बोल ले
तो मैं सबकुछ भूल जाती हूं
उसके प्रति पैदा होनेवाली कटुता
उसके प्रति पैदा होने वाली नफरत
सबकुछ भूल जाता है ये मन
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
कोई जिसने मुझे हमेशा नीचा दिखाया हो
मुझे हमेशा गिराने की कोशिश की हो
वह भी मेरे आगे
दोस्ती का हाथ बढ़ा दे
रोकर, गिड़गिड़ाकर
मुझसे मदद मांगे तो
मेरा दिल उसके लिए भी
पसीज जाता है
मैं उसे भी
अपना दोस्त मानने लगती हूं।
यह दुनियां कितनी मतलबी है
यहां कदम- कदम पर धोखे हैं
आखिर कब समझ आएगी
मुझे यह बात
कभी- कभी सोचती हूं मन में
पर इस कब का कोई उत्तर नहीं है मेरे पास।
मेरी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि
दिल में किसी के प्रति
नफरत टिकती ही नहीं है
हालांकि मुझे हर वो बात
याद रहती है
जब किसी ने मेरा दिल दुखाया था
पर जब वो शख्स
मेरे सामने मुस्कुराकर
प्यार के दो शब्द बोल दे
तो दिल कह उठता है
उसे माफ कर दो।
मैं चाहकर भी
पत्थर दिल नहीं बन पाती
शायद मेरी यही सबसे बड़ी कमजोरी है
कि मैं दिल से रिश्ते निभाती हूं।
मैं क्या करूं
मुझे आता ही नहीं है
किसी से लंबे समय तक रूठे रहना
किसी के लिए
शिकायतें संजोकर रखना
कभी- कभी सोचती हूं
क्यों इतनी जल्दी
पिघल जाता है मेरा दिल।
बड़ा भावुक है मेरा मन
शायद यही वजह है कि
मैं हरबार छली जाती हूं
लोग मुझे अपनी मीठी बातों से
बहला- फुसला देते हैं।
कभी- कभी कहती हूं खुद से
तुम थोड़ी चालक बन जाओ
थोड़ा पत्थर दिल बन जाओ
वरना इस शातिर दुनियां में
जी नहीं जाओगी।
पर समझ नहीं आता
कैसे बदलूं इस दिल को
जो नफरत के बदले भी
दुआएं देता है।
लोग मेरी इस मासूमियत पर
मेरी हंसी उड़ाते हैं
मुझे बेवकूफ, नादान और भी
न जाने क्या- क्या कहते हैं।
पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
मैं जैसी भी हूं
अच्छी हूं
मुझे नहीं बनना
लोगों की तरह
छलिया, कपटी, शातिर, चालक
क्योंकि मैं अच्छी तरह जानती हूं
जो जैसा बीज बोता है
वैसा ही काटता है।
उन्हें अपने कर्मों का फल मिलेगा
मुझे अपने कर्मों का
अब बस मैं इतना बदलाव चाहती हूं
कि माफ करूं तो
खुद को भूलकर नहीं
किसी से प्यार करूं तो
अपनी कीमत खोकर नहीं
और रिश्ते निभाऊं तो
अपनी खुशी छोड़कर नहीं।




